Poems

ज़िन्दगी… बहे जा रही थी ..

ज़िन्दगी…..यूँ तो चले जा रही थी…
साँसो के साथ बहे जा रही थी,
उसे कहीं रुकना नहीं था ।
उसे रुकने का कहकर, मुझे कहीं झुकना नहीं था ॥

इसी भागा दौड़ी में थमे जा रही थी…
ख़ामोशी की ठंडक में जमे जा रही थी ,
उसे कुछ कहना नहीं थी।
मुझे कुछ सुनना नहीं था ॥

पेशोपेश में किसी ,खोये जा रही थी…
वो जगा रही थी और मैं सोये जा रही थी,
उसे रोना नहीं था ।
और शायद मुझे हंसना नहीं था ॥


कशमकश में चुपचाप गुजरे जा रही थी…
मैं उसे कमाना चाह रही थी और वह बीते जा रही थी,
उसे अमर होना नहीं था ।
और मुझे शायद मरना नहीं था ॥

8 thoughts on “ज़िन्दगी… बहे जा रही थी ..”

  1. बहुत गहराई है तुमहारी इस अभिव्यक्ति में. अति सुन्दर 👌👌👌

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